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Saturday, June 30, 2018

Mutual funds


 म्यूचुअल फंड क्या है


 म्यूचुअल फंड क्या है, कैसे काम करता है और क्या हैं इसके फायदे आइये आज हिंदी में जानते हैं. यह कैसे काम करता है और क्या हैं इसके फायदे. यूनिट किसे कहते हैं, म्यूचुअल फंड में निवेश कैसे कर सकते हैं और कैसे यह शेयर बाज़ार में सीधे निवेश करने के बजाए ज्यादा सुरक्षित निवेश माना जाता है। ज्यादातर लोगों को म्यूचुअल फंड अथवा इस जैसे अन्य वित्तीय शब्दजाल सुन कर डर लगता है। आप बारीकी से इसे देखो तो म्यूचुअल फंड की बुनियादी बातों को समझने के लिए डरने की वास्तव में बहुत ज्यादा आवश्यकता नहीं है। इसलिए इसे समझाने के लिए एक बुनियादी सवाल का जवाब देना जरुरी है कि म्यूचुअल फंड क्या है?
निवेशकों की एक बड़ी संख्या के द्वारा जमा पैसा राशी को म्यूचुअल फंड कहते हैं जिसे एक फण्ड में डाल दिया जाता है। फण्ड मेनेजर इस पैसे को विभिन्न वित्तीय साधनों में निवेश करने के लिए अपने निवेश प्रबंधन कौशल का उपयोग करता है.  म्यूचुअल फंड कई तरह से निवेश करता है जिससे उसका रिस्क और रिटर्न निर्धारित होता है.
जब बहुत से निवेशक मिल कर एक फण्ड में निवेश करते हैं तो फण्ड को बराबर बराबर हिस्सों में बाँट दिया जाता है जिसे इकाई या यूनिट Unit कहते हैं|
उदाहरण के लिये मान लीजिये कि कुछ दोस्त मिल कर एक जमीन का टुकडा खरीदना चाहते हैं। सौ वर्ग गज के जमीन के टुकडे की कीमत एक लाख रुपये है। अब यदि इस फंड को दस रु कि युनिट्स में बांटेंगे तो 10,000 यूनिट बनेंगे. निवेशक जितने चाहे उतने यूनिट अपनी निवेश क्षमता के अनुसार खरीद सकते हैं. यदि आपके पास केवल एक हज़ार रुपये निवेश के लिए हैं तो आप सौ यूनिट खरीद सकते हैं. उसी अनुपात में आप भी उस निवेश (जमीन के) मालिक हो गए.
अब मान लीजिये की इस एक लाख के निवेश की कीमत बढ़ कर एक महीने के बाद रुपये 1,20,000 हो गयी. अब इस निवेश के अनुसार यूनिट की कीमत निकाली जायेगी तो दस रुपये वाला यूनिट अब बारह रुपये का हो चुका है. जिस निवेशक ने एक हजार रुपये में सौ यूनिट खरीदे थे, बारह रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से अब उसका निवेश (100X12) रुपये 1200 हो चुका है.
एक निवेशक के रूप में आप द्वारा निवेश की गई राशि पर आधारित है कि आप कितनी यूनिट्स के मालिक हैं। इसलिए, एक निवेशक भी एक यूनिट धारक के रूप में जाना जा सकता है। इसमें से अर्जित अन्य आय के साथ-साथ निवेश के मूल्य में वृद्धि को लागू व्यय, भार और करों को घटाने के बाद यूनिटों की संख्या के साथ अनुपात में निवेशकों / यूनिट धारकों को बांट दिया जाता है।
Types of Mutual Funds in Hindi म्यूचुअल फण्डों के प्रकार :  आज हम समझेंगे कि म्यूचुअल फण्डकिस किस प्रकार के होते हैं और  इनकी कौन कौन सी श्रेणियां होती हैं. भिन्न भिन्न प्रकार  के म्यूचुअल फण्ड कहाँ और कैसे निवेश करते हैं और किस प्रकार के म्यूचुअल फण्ड में कितना रिस्क होता है. यह भी समझेंगे कि कौन सा म्यूचुअल फण्ड का प्रकार रिस्क फ्री होता है और किस में अधिक कमाई के मौके आ सकते हैं. अलग अलग तरह के म्यूचुअल फण्ड इस तरह डिजाईन कियी जाते हैं कि अलग अलग श्रेणी के निवेशक अपने जोखिम लेने की क्षमता, निवेश के लक्ष्यों, निवेश की अवधि और निवेश की राशी के अनुसार उनका चयन कर सकें.

ओपन एंडेड और क्लोज्ड एंडेड 

जब आप Types of Mutual Funds in Hindi को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो यहाँ आपको बता दें कि म्यूचुअल फण्डों को हम मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं  ओपन एंडेड और क्लोज्ड एंडेड.

ओपन एंडेड योजना

ओपन एंडेड योजना में योजना अवधि के दौरान किसी भी समय निवेशक इकाइयों यानि यूनिट्स को खरीद या बेच सकता है. इसकी कोई  निश्चित मैच्योरिटी यानि परिपक्वता तिथि नहीं होती. आप जब आवश्यक हो अपने निवेश को भुना सकते हैं यानी ओपन एंडेड स्कीम में लिक्विडिटी अर्थार्थ तरलता रहती है. कुछ ओपन एंडेड फंड्स में लॉक इन पीरियड रहता है जैसे कि ELSS स्कीम. लॉक इन पीरियड के दौरान आप अपने यूनिट्स को रिडीम नहीं कर सकते. म्यूचुअल फण्डों की ओपन एंडेड फंड्स की श्रेणी में डेट फण्ड Debt Fund, लिक्विड फण्ड Liquid Fund, इक्विटी फण्ड Equity Fund और बैलेंस्ड फण्ड Balanced Fund आ म्यूचुअल फण्डकिस किस प्रकार के होते हैं और  इनकी कौन कौन सी श्रेणियां होती हैं. भिन्न भिन्न प्रकार  के म्यूचुअल फण्ड कहाँ और कैसे निवेश करते हैं और किस प्रकार के म्यूचुअल फण्ड में कितना रिस्क होता है. यह भी समझेंगे कि कौन सा म्यूचुअल फण्ड का प्रकार रिस्क फ्री होता है और किस में अधिक कमाई के मौके आ सकते हैं. अलग अलग तरह के म्यूचुअल फण्ड इस तरह डिजाईन कियी जाते हैं कि अलग अलग श्रेणी के निवेशक अपने जोखिम लेने की क्षमता, निवेश के लक्ष्यों, निवेश की अवधि और निवेश की राशी के अनुसार उनका चयन कर सकें.


डेबिट फण्ड  Debt Fund में अधिकतर निवेश डिबेंचर, सरकारी प्रतिभूतियों और अन्य ऋण उपकरणों में किया जाता है. डेट फण्ड इक्विटी फण्ड के मुकाबले कम लाभ दे सकते हैं मगर कम जोखिम के साथ यह फण्ड एक निश्चित लाभ देने में सक्षम हो सकते हैं. एक स्थिर आय चाहने वालों के लिए यह फण्ड आदर्श हो सकते हैं.
लिक्विड फण्ड Liquid Fund कम समय के लिए यदि आपके पास पैसे पड़े हैं तो आप उन्हें यहाँ निवेश कर सकते हैं. लिक्विड फण्ड Short Term Debt Instruments यानि अल्पकालिक ऋण उपकरणों में निवेश करते हैं. लिक्विड फण्ड कम चार्जेज के साथ एक सुरक्षित निवेश का विकल्प प्रदान करते हैं.
इक्विटी फण्ड Equity Fund इक्विटी फण्ड शेयर बाजार में निवेश करते हैं. यह वो श्रेणी है जहां अधिकतर निवेशक म्यूचुअल फण्ड में निवेश करते हैं. हालाँकि छोटी अवधि इक्विटी फण्ड में निवेश जोखिम भरा हो सकता है मगर लम्बी अवधि में आप इन फंड्स में अच्छे रिटर्न की उम्मीद कर सकते हैं. इक्विटी फंड्स के कुछ मुख्य श्रेणियां हैं इंडेक्स फण्ड Index Fund, सेक्टोरल फण्ड Sectoral Fund, ईएलएसएस फण्ड ELSS Fund, Mid Cap Small Cap Fund मिड कैप स्माल कैप फण्ड और Diversified fund डाइवर्सिफाइड फण्ड. सभी प्रकार के इक्विटी फंड्स पर उनके निवेश के प्रकार, जोखिम और लाभ की संभावनाएं अलग  रहती हैं.
बैलेंस्ड फण्ड Balanced Fund कम जोखिम के साथ अधिक लाभ पाने की चाह रखने वाले निवेशकों के लिए इस प्रकार की योजनायें आदर्श हैं. बैलेंस्ड फण्ड पहले से निर्धारित अनुपात में इक्विटी और फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज में निवेश करते हैं. इक्विटी में निवेश फण्ड को तेजी से बढ़ने में मदद करता है और फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज में निवेश फण्ड को  सुरक्षित विकास की तरफ ले जाता है.

क्लोज्ड एंडेड योजना

क्लोज्ड एंडेड योजना में केवल योजना की शुरुआत में जब  NFO यानि New Fund Offer जारी किया जाता है तभी निवेश कर सकते हैं. क्लोज्ड एंडेड योजना में एक मैच्योरिटी यानि परिपक्वता तिथि पहले से निर्धारित होती है. परिपक्वता तिथि से पहले क्लोज्ड एंडेड योजना से बाहर नहीं निकला जा सकता इसलिए कह सकते हैं कि क्लोज्ड एंडेड योजना में लिक्विडिटी अर्थार्थ तरलता नहीं होती है. क्लोज्ड एंडेड योजनाओं में मुख्य रूप से दो तरह के फण्ड होते हैं कैपिटल प्रोटेक्शन फण्ड Capital Protection Fund और फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान Fixed Maturity Plan.
कैपिटल प्रोटेक्शन फण्ड Capital Protection Fund में मुख्य रूप से निवेश की गई राशी को सुरक्षित रखते हुए लाभ कमाने के लिए निवेश किया जाता है. इस योजना में मुख्य रूप से फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज में निवेश किया जाता है मगर एक छोटा भाग इक्विटी में भी निवेश किया जाता है. इन फंड्स में कैपिटल को सुरक्षित रखने का दबाव रहता है और क्योंकि यह एक क्लोज्ड एंडेड योजना होती है इसीलिए केवल निश्चित समय अवधि तक ही निवेश किया जाता है इसलिए फण्ड मेनेजर के पास अधिक रिस्क लेने की संभावना ही नहीं रहती है.
फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान Fixed Maturity Plan में पहले से मैच्योरिटी का समय निर्धारित रहता है और ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश किया जाता है जो फण्ड की अवधि के साथ मैच्योर हो रहे हों. इस प्रकार के फंड्स में भी चार्जेज कम रहते हैं क्योंकि फण्ड मेनेजर को पहले से निर्धारित इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करना होता है और फण्ड प्रबंधन के लिए अधिक कुछ करने की संभावना ही नहीं बचती.
तो यह थी Types of Mutual Funds in Hindi म्यूचुअल फण्डों के प्रकार के बारे में हिंदी में समझने की कोशिश. आशा है कि अलग अलग तरह के म्यूचुअल फण्डों में कैसे निवेश किया जाता है और उनमें कितना जोखिम संभव है और कितनी लाभ की संभावनाएं यह सब समझ आ गया होगा.
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Sunday, May 20, 2018

History of the Kings of Garhwal Himalaya

परमार राजा
परमार राजाओं की राजधानी उत्तरी गढ़वाल मैं चाँदपुरगढ़ मैं थी। परमार राजाओं का वंशानुक्रम इस प्रकार है।
1  कनकपाल
2  श्यामपाल
3  पाण्डुपाल
4  अभिगतपाल
5  सिगतपाल
6  रत्नपाल
7 सालीपाल
8  विधिपाल
9  मदनपाल
10 भक्तिपाल
11 जयचन्दपाल
12 पृथ्वीपाल
13 मदनपाल
14 अगस्तिपाल
15 कृतिपाल
16 जयपाल
17 अनन्तपाल
18 आनन्दपाल
19 विभोगपाल
20 सुवियानपल
21 विक्रमपाल
22 विचित्रपाल
23 हंसपाल
24 सोनपाल
25 कांतिपाल
26 कामदेवपाल
27 सलषण देव
28 लषण देव
29 मुकुन्द देव
30 पूर्वदेव
31 अभय देव
32 जयराम देव
33 असलदेव पाल
34 जगत पाल
35 जीत पल
36 आनन्दपाल
37 अजयपाल
 यहां पर से इतिहासकारों के अलग अलग  मत है, कुछ मानते है कि परमार वंश की नींव अजयपाल ने रखी और कुछ इतिहासकार मानते है कि परमार राज्य की स्थापना कनकपाल जी ने की है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अजय पाल जी ने अपनी राजधानी चाँदपुरगढ़ से श्रीनगर स्थापित कर दी थी।
श्रीनगर के परमार शासक
37 अजयपाल
38 कल्याणपाल
39 सुन्दर पल
40 हंसदेवपाल
41 विजयपाल
42 सहजपाल
43 बलभद्रपाल (बलभद्र पाल ने बाद में शाह जोड़ दिया और वे बलभद्र शाह के नाम से जाने गए )
44 मानशाह
45 श्याम शाह
46 महीपति शाह
47 पृथ्वीपति शाह
48 मेदिनी शाह
49 फते शाह
50 उपेन्द्र शाह
51 प्रदीप शाह
52 ललित शाह
53 जयकृत शाह
54 प्रद्युम्न शाह (उस समय गोरखों के आक्रमण के कारण  कुछ समय गोरखों का राज रहा बाद मैं सुदर्शन शाह ने गोरखों को पराजित किया)
55 सुदर्शन शाह (सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी टिहरी स्थापित की)
56 भवानी शाह
57 प्रताप शाह
58 राजर्षि कीर्ति शाह
59 नरेन्द्र शाह
60 मानवेन्द्र शाह (दिनांक 5 -01-2007 को देहांत)
61 राजमाता कमलेन्दुमति (अथिति तक)






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Friday, May 18, 2018

for shoping

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Tuesday, March 6, 2018

Joshimath emerging city..........

                       सातवीं से इगारवीं सदी के बीच जोशीमठ कत्यूरी राजाओं की राजधानी थी| जिसका नाम कार्तिकेयपुर था| उस समय कुमाऊँ और गढ़वाल उनका शासन था| हिन्दुओं के धार्मिक स्थल की प्रधानता के रूप मैं जोशीमठ आदि गुरु शंकराचार्य की सम्बधता के कारण मान्य हुवा है| जोशीमठ शब्द जोतिरमठ शब्द का अपभ्रंश है| आदि गुरु शंकराचार्य ने जोशीमठ मैं एक विद्यापीठ की स्थापना की और इसको ज्योतिर्मठ का नाम दिया| जोशीमठ बद्रीनाथ के रास्ते पर एक महत्पूर्ण धार्मिक केंद्र होने के अलावा एक व्यापार केन्द्र भी था| भोटिया लोग अपना माल बिक्री हेतु जोशीमठ लेते थे| जोशीमठ क्षेत्र की धार्मिक पृष्टभूमि मैं नरसिह मन्दिर, ज्योतिर्मठ ओर शहतूत का पुरातन वृक्ष हैं|
                          दूनिया मैं केवल जोशीमठ के नरसिंह मन्दिर मैं भगवान विष्णु के शान्त स्वरुप के दर्शन किये जाते है|नरसिंह मन्दिर के सम्बन्ध मैं एक रहस्य का वर्णन स्कन्द पुराण के केदार खण्ड मैं हैं, कि शालिकग्राम के कलाई दिन पर दिन पतली होती जा रही है| जब वह शरीर से अलग होकर गिर जायेगी, तब नर व नारायण पर्वतों  के टकराने से बद्रीनाथ के सारे रास्ते हमेशा के लिए बन्द हो जायेंगे, और फिर भगवान विष्णु की पूजा भविष्य बद्री मैं की जाएगी| जो की तपोवन से दो किमी० दूर है| पर्यटन की दृष्टी से जोशीमठ मैं बहुत सुन्दर-सुन्दर  पर्वतों  की शृंखला हैं| जोशीमठ से एक सड़क विश्व प्रसिद स्थान औली को, दूसरी सड़क मलारी-नीति को तथा तीसरी सड़क बद्रीनाथ-माणा को जाती हैं|तीनों जगह को देखकर अलौकिक सुन्दरता और शान्ति प्राप्त होती है|






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Thursday, March 1, 2018

गोपेश्वर भगवान शिव की तपोभूमि

                गोपेश्वर सीमांत जनपद चमोली की राजधानी है, गोपेश्वर नगर मैं भगवान शिव ने तपस्या की थी| जहाँ पर उनका एक भव्या मन्दिर है, जो गोपीनाथ मन्दिर के नाम से प्रसिद है|  जो की प्राचीनतम है, मन्दिर के आगन मैं एक ५ मीटर ऊँचा त्रिशूल है, जो की बारवी शताब्दी का है, और अस्टधातू का बना है| इस सम्बन्ध मैं एक दन्तकथा ये है, कि भगवान शिव ने कामदेव को मारने के लिए अपना त्रिशूल फेंका तो वह यहाँ गढ़ गया| त्रिशूल की धातु अभी तक सही स्थिति मैं है, जिस पर मौसम प्रभावहीन है| यह माना जाता है, कि शारीरिक बल से इस त्रिशूल को हिलाया भी नही जा सकता है| जबकि यदि कोई भक्त इसे छू भी ले तो इसमें कम्पन होने लगती है|
             गोपेश्वर से पंचकेदारों मैं एक तुंगनाथ को जाने वाला मार्ग केदारनाथ जाने वाले रस्ते पर चोपता से उपर को पड़ता है| चोपता से तुंगनाथ ३ किमी पैदल की दूरी पर स्थित है| जो की बड़ा की मनभावक ओर रमणीक स्थान है| वहाँ जाने के बाद वहां से बापस आने का बिलकुल मन नही होता है| तुंगनाथ की पूजा तुंगनाथ मैं ६ माह और बाकि के ६ माह शीतकाल मैं मक्कूमठ (मक्कू ग्राम) मैं होती है| माना जाता है, कि तुंगनाथ जी का ये मन्दिर १००० वर्ष पुराना है, जिसे की पाण्ड्वो ने भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु बनाया था|
             रुद्रनाथ गोपेश्वर से ५ किमी० की दूरी पर सगर नामक ग्राम है, जहाँ से रुद्रनाथ २१ किमी० पैदल यात्रा है| जो कि पंचकेदारों मैं से एक है| सगर से १० किमी० की दूरी पर पनार बुग्याल है| जहाँ से उपर बृक्ष नहीं होते हैं| मखमली घास के मैदान यकायक सरे दृष्य को परिवर्तित कर देते है| अलग-अलग किस्म की घास, जड़ी-बूटी, ओर फूलों से यात्री मोहपाश मैं बंधते चले जाते हैं| यात्रियों के ऊपर जाते ही प्रकृति का खुला रूप देखते हो बनता है| रुद्रनाथ से नन्दादेवी, कामेट, त्रिशूल, नंदाघुटी शिखरों का नजारा बड़ा ही मनभावक होता है| रुद्रनाथ मैं ब्रहमकमल बहुतायत मैं खिलते हैं| रुद्रनाथ मैं केवल भगवान शिव के मुख की पूजा होती है| पूजा मात्र ६ मास के लिए होती है| शीतकाल के ६ मास की पूजा गोपेश्वर के गोपीनाथ मन्दिर मैं होती है|



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Monday, February 26, 2018

pollution damage

प्रदुषण हमारे समाज को हर तरह से दूषित कर रहा है| प्रदुषण मुख्य रूप से निम्न प्रकार के होते है|
१- वायू प्रदुषण- वायु प्रदुषण मुख्य तौर से अत्यधिक वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैस से होता है| दुनिया मैं दुनिया की आबादी के बराबर ही वाहन हो गये है| दूसरी और फेक्टरी से निकलने वाले जहरीली गैस से प्राणियों को साँस लेना कठिन होता जा रहा है| जिसका समय से उपचार करना आवश्यक है|
२-ध्वनि प्रदुषण- बाजारों मैं गाडियों के हॉर्न और माइक स्पीकर की ध्वनि कानों के परदे फाड़ने को आतुर हुई है|  जिसका उपचार किया जाना आवश्यक है| गाड़ियों मैं लॉ कम तीव्रता के हॉर्न का प्रयोग किया जाय| 
३- जल प्रदुषण - आधुनिक समाज मैं सबसे बड़ा खतरा जल का ही है| फेक्ट्रीयों से निकला अवसिस्ट पदार्थ या सीवर लाइन का सारा पदार्थ नदियों मैं  डालने से नदियों का जल दुसित हो रहा है| आप देख सकते हैं, दिल्ली मैं यमुना मया जी का हाल| जिसका निदान किया जाना आवश्यक है|
४- भूमि प्रदुषण- भूमि प्रदुषण कचरे के फेलने और रासायनिक रिसाव के कारण भूमि खराब हो रही है| अत्यधिक रासायनिक उर्बरक और दवाओं के छिडकाव के कारण भी भूमि ख़राब हो रही है| जिससे भूमि का बचाव किया जाना आवश्यक है| यदि एसा नही किया गया तो भविष्य मैं आने वाली पीडी के द्वारा भूमि मैं एक अन्न का दाना नही उगाया जा सकेगा|
5-परमाणु हतियार- सबसे बड़ा दुर्भाग्य है, परमाणु हतियारों का अविष्कार, जिससे एक और कई मौतें एक साथ हो जाती है | वहीँ दूसरी और उससे होने वाले प्रदुषण महा बिनास कारी परिणाम निकल रहे है| उदहारण हिरासमा और नागासाकी है|
प्रदुषण समाज मैं एक भयानक बीमारी है| यदि इससे बचाव का उपाय अभी नही किया तो कहीं देर न हो जाय| इसका एक मात्र उपाई है| वृक्षों का रोपण करना | सरकार को चाहिए की audinace पास करे की प्रत्येक व्यक्ति एक वर्ष मैं ३ नये पौधे लगाएगा| और उनकी देख-रेख भी करे| तभी हमारे समाज से प्रदुषण का नाश हो सकता है|


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Sunday, February 25, 2018

Discovery of Forest

Discovery of Forest in villege devkhal of Himalayn Range हिमालय पर्वत श्रृंखला में गांव देवखाल के वन की खोज


हिमालय पर्वत श्रृंखला में गांव देवखाल के वन की खोज
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52 is the Fort in Garhwal

गढ़वाल गढ़ों की गढ़देश

गढवाल शाब्दिक अर्थ है गढ़वाला। पहले यहां 52 गढ़ हुआ करते थे, इसलिए इसे बावन गढ़ों का देश "गढ़देश" (छोटे छोटे किलों का देश) कहा जाता था। असल में तब गढ़वाल में 52 राजाओं का आधिपत्य था। उनके अलग अलग राज्य थे और वे स्वतंत्र थे। इन 52 गढ़ों के अलावा भी कुछ छोटे छोटे गढ़ थे जो सरदार या थोकदारों (तत्कालीन पदवी) के अधीन थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इनमें से कुछ का जिक्र किया था। ह्वेनसांग छठी शताब्दी में भारत में आया था। इन राजाओं के बीच आपस में लड़ाई में चलती रहती थी। माना जाता है कि नौवीं शताब्दी लगभग 250वर्षों तक इन गढ़ों की स्थिति बनी रही लेकिन बाद में इनके बीच आपसी लड़ाई का पवांर वंश के राजाओं ने लाभ उठाया और 15वीं सदी तक इन गढ़ों के राजा परास्त होकर पवांर वंश के अधीन हो गये। इसके लिये पवांर वंश के राजा अजयपाल सिंह जिम्मेदार थे जिन्होंने तमाम राजाओं को परास्त करके गढ़वाल का नक्शा एक कर दिया था। 

गढ़वाल में वैसे आज भी इन गढ़ों का शान से जिक्र होता और संबंधित क्षेत्र के लोगों को उस गढ़ से जोड़ा जाता है। मैं बचपन से इन गढ़ों के आधार पर लोगों की पहचान सुनता आ रहा हूं। गढ़वाल के 52 गढ़ों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है ... 
पहला ... नागपुर गढ़ : यह जौनपुर परगना में था। यहां नागदेवता का मंदिर है। यहां का अंतिम राजा भजनसिंह हुआ था। 
दूसरा ... कोल्ली गढ़ : यह बछवाण बिष्ट जाति के लोगों का गढ़ था। 
तीसरा ... रवाणगढ़ : यह बद्रीनाथ के मार्ग में पड़ता है और रवाणीजाति का होने के कारण इसका नाम रवाणगढ़ पड़ा। 
चौथा ... फल्याण गढ़ : यह फल्दकोट में था और फल्याण जाति के ब्राहमणों का गढ़ था। कहा जाता है कि यह गढ़ पहले किसी राजपूत जाति का था। उस जाति के शमशेर सिंह नामक व्यक्ति ने इसे ब्राह्मणों का दान कर दिया था। 
पांचवां ... वागर गढ़ : यह नागवंशी राणा जाति का गढ़ था। इतिहास के पन्नों पर झांकने पर पता चलता है कि एक बार घिरवाण खसिया जाति ने भी इस पर अधिकार जमाया था। 
छठा ... कुईली गढ़ : यह सजवाण जाति का गढ़ था जिसे जौरासी गढ़ भी कहते हैं। 
सातवां ... भरपूर गढ़ : यह भी सजवाण जाति का गढ़ था। यहां का अंतिम थोकदार यानि गढ़ का प्रमुख गोविंद सिंह सजवाण था। 
आठवां ... कुजणी गढ़ : सजवाण जाति से जुड़ा एक और गढ़ जहां का आखिरी थोकदार सुल्तान सिंह था। 
नौवां ... सिलगढ़ : यह भी सजवाण जाति का गढ़ था जिसका अंतिम राजा सवलसिंह था। 
दसवां ... मुंगरा गढ़ : रवाई स्थित यह गढ़ रावत जाति का था और यहां रौतेले रहते थे। 
11वां ... रैका गढ़ : यह रमोला जाति का गढ़ था। 

12वां ... मोल्या गढ़ : रमोली स्थित यह गढ़ भी रमोला जाति का था। 

13वां ... उपुगढ़ : उद्येपुर स्थित यह गढ़ चौहान जाति का था। 

14वां ... नालागढ़ : देहरादून जिले में था जिसे बाद में नालागढ़ी के नाम से जाना जाने लगा। 

15वां ... सांकरीगढ़ : रवाईं स्थित यह गढ़ राणा जाति का था। 

16वां ... रामी गढ़ : इसका संबंध शिमला से था और यह भी रावत जाति का गढ़ था। 

17वां ... बिराल्टा गढ़ : रावत जाति के इस गढ़ का अंतिम थोकदार भूपसिंह था। यह जौनपुर में था। 

18वां ... चांदपुर गढ़ : सूर्यवंशी राजा भानुप्रताप का यह गढ़ तैली चांदपुर में था। इस गढ़ को सबसे पहले पवांर वंश के राजा कनकपाल ने अपने अधिकार क्षेत्र में लिया था। 

19वां ... चौंडा गढ़ : चौंडाल जाति का यह गढ़ शीली चांदपुर में था। 

20वां ... तोप गढ़ : यह तोपाल जाति का था। इस वंश के तुलसिंह ने तोप बनायी थी और इसलिए इसे तोप गढ़ कहा जाने लगा था। तोपाल जाति का नाम भी इसी कारण पड़ा था। 

21वां ... राणी गढ़ : खासी जाति का यह गढ़ राणीगढ़ पट्टी में पड़ता था। इसकी स्थापना एक रानी ने की थी और इसलिए इसे राणी गढ़ कहा जाने लगा था। 

22वां ... श्रीगुरूगढ़ : सलाण स्थित यह गढ़ पडियार जाति का था। इन्हें अब परिहार कहा जाता है जो राजस्थान की प्रमुख जाति है। यहां का अंतिम राजा विनोद सिंह था। 

23वां ... बधाणगढ़ : बधाणी जाति का यह गढ़ पिंडर नदी के ऊपर स्थित था। 

24वां ... लोहबागढ़ : पहाड़ में नेगी सुनने में एक जाति लगती है लेकिन इसके कई रूप हैं। ऐसे ही लोहबाल नेगी जाति का संबंध लोहबागढ़ से था। इस गढ़ के दिलेवर सिंह और प्रमोद सिंह के बारे में कहा जाता था कि वे वीर और साहसी थे। 

25वां ... दशोलीगढ़ : दशोली स्थित इस गढ़ को मानवर नामक राजा ने प्रसिद्धि दिलायी थी। 

26वां ... कंडारागढ़ : कंडारी जाति का यह गढ़ उस समय के नागपुर परगने में थे। इस गढ़ का अंतिम राजा नरवीर सिंह था। वह पंवार राजा से पराजित हो गया था और हार के गम में मंदाकिनी नदी में डूब गया था। 

27वां ... धौनागढ़ : इडवालस्यू पट्टी में धौन्याल जाति का गढ़ था। 

28वां ... रतनगढ़ : कुंजणी में धमादा जाति का था। कुंजणी ब्रहमपुरी के ऊपर है। 

29वां ... एरासूगढ़ : यह गढ़ श्रीनगर के ऊपर था। 

30वां ... इडिया गढ़ : इडिया जाति का यह गढ़ रवाई बड़कोट में था। रूपचंद नाम के एक सरदार ने इस गढ़ को तहस नहस कर दिया था। 

31वां ... लंगूरगढ़ : लंगूरपट्टी स्थिति इस गढ़ में भैरों का प्रसिद्ध मंदिर है। 

32वां ... बाग गढ़ : नेगी जाति के बारे में पहले लिखा था। यह बागूणी नेगी जाति का गढ़ था जो गंगा सलाण में स्थित था। इस नेगी जाति को बागणी भी कहा जाता था। 

33वां ... गढ़कोट गढ़ : मल्ला ढांगू स्थित यह गढ़ बगड़वाल बिष्ट जाति का था। नेगी की तरह बिष्ट जाति के भी अलग अलग स्थानों के कारण भिन्न रूप हैं। 

34वां ... गड़तांग गढ़ : भोटिया जाति का यह गढ़ टकनौर में था लेकिन यह किस वंश का था इसकी जानकारी नहीं मिल पायी थी। 

35वां ... वनगढ़ गढ़ : अलकनंदा के दक्षिण में स्थित बनगढ़ में स्थित था यह गढ़। 

36वां ... भरदार गढ़ : यह वनगढ़ के करीब स्थित था। 

37वां ... चौंदकोट गढ़ : पौड़ी जिले के प्रसिद्ध गढ़ों में एक। यहां के लोगों को उनकी बुद्धिमत्ता और चतुराई के लिये जाना जाता था। चौंदकोट गढ़ के अवशेष चौबट्टाखाल के ऊपर पहाड़ी पर अब भी दिख जाएंगे। 

38वां ... नयाल गढ़ : कटुलस्यूं स्थित यह गढ़ नयाल जाति था जिसका अंतिम सरदार का नाम भग्गु था। 

39वां ... अजमीर गढ़ : यह पयाल जाति का था। 

40वां ... कांडा गढ़ : रावतस्यूं में था। रावत जाति का था। 

41वां ... सावलीगढ़ : यह सबली खाटली में था। 

42वां ... बदलपुर गढ़ : पौड़ी जिले के बदलपुर में था। 

43वां ... संगेलागढ़ : संगेला बिष्ट जाति का यह गढ़ यह नैल चामी में था। 

44वां ... गुजड़ूगढ़ : यह गुजड़ू परगने में था। 

45वां ... जौंटगढ़ : यह जौनपुर परगना में था। 

46वां ... देवलगढ़ : यह देवलगढ़ परगने में था। इसे देवलराजा ने बनाया था। 

47वां ... लोदगढ़ : यह लोदीजाति का था। 

48वां ... जौंलपुर गढ़ 

49वां ... चम्पा गढ़ 

50वां ... डोडराकांरा गढ़ 

51वां ... भुवना गढ़ 

52वां ... लोदन गढ......


at February 25, 2018 No comments:
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There is no place like Badrinath, neither in the past nor in the future

''बदरी सद्रश्यां भूतो. न भविष्यति''

पृथ्वी पर साक्षात् भू वैकुंठ मने जाने वाले, और ना सिर्फ मानव ही बल्कि देवता भी जिनकी अर्चना वन्दना के लिए लालाहित रहते है, ऐसे श्री हरी भगवान बदरी बिशाल के कपाट ब्रह्म मुहूर्त पर ४ बज कर १५ पर खुलेंगे, शीतकाल मै ६ महीने तक कपाट बंद रहते है, मान्यता है की इस अवधि मै देवता गण भगवान के दर्शन बंदन करते हैं| और देव ऋषि भगवान बदरी बिशाल के प्रधान पुजारी के रूप मैं होते हैं|  कपाट खुलने पर मानव श्री हरी के दर्शन, बंदन और अर्चन करते हैं| और दक्षिण बारात के केरल प्रान्त के नम्बुरी ब्राहमण भगवान के प्रधान पुजारी के रूप मै श्री बदरी बिशाल की पूजा अर्चना करते हैं| इन्हें रावल जी महाराज के नाम से जाना जाता है|  भगवान के स्नान, श्रींगार स्पर्श का अधिकार मात्र रावल जी को होती हैं|
बद्रीनाथ मैं भगवान विष्णु की पूजा होती है| तथा यह मन्दिर आदि गुरु शंकराचार्य जी ने  ९ विं शताब्दी मै बनवाया है, एसी मान्यता हैं| भगवान बद्रीनाथ जी का यह मन्दिर अलकनन्दा नदी के किनारे उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जिले मैं है|  लोक कथा है की यह स्थान पहले बागबान शिव भूमि के नाम से व्यवस्थित था| भगवान विष्णु अपने ध्यान करने के लिए एक स्थान खोज रहे थे, अलकनन्दा नदी के किनारे उन्हें यह स्थान भा गया, और वे यहाँ पर बल रूप मैं अवतरित हिये|  और क्रंदन करने लगे, उनका रुदन सुन कर माता पार्वती हृदय द्रवित हो उठा| माता पार्वती और भगवान शिव उस बालक के समीप उपस्थित हो ऊठे| माता ने उस बालक ले पुछा की बालक तुम्हें क्या चाहिए, तो भगवान विष्णु ने उनसे वह स्थान मांग लिया| और भगवान शिव ने उन्हें पहचान लिया और वह स्थान भगवान विष्णु को दे दिया|
बद्रीनाथ मैं तप्त कुंड है| भगवान के दर्शन करने से पूर्व तप्त कुंड मै स्नान किया जाता हैं|  अपने जीवन काल मै एक बार बद्रीनाथ अवश्य जाना चाहिए| बद्रीनाथ रमणीक स्थान हैं|
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